Tuesday, June 16, 2009

माँ ! प्यारी माँ ! ६

"अम्मा ! आप कुछ देर बाहर गयीं हैं, तो मैंने आगे लिखने का मौक़ा हथिया लिया...! जानती हूँ, आपके घरमे रहते मै, नेट पे बैठ जाती हूँ, तो आपको बड़ा घुस्सा आता है...!

"कुछ रोज़ पूर्व, चंद अल्फाज़ लिखे थे....शायद हर बेटी को यही महसूस होता हो...या फिर जिन बेटियों को ये महसूस होता है, उनकी माँ उस क़ाबिल होती हो!

"मिलेगी कोई गोद यूँ,
जहाँ सर रख लूँ?
माँ! मै थक गयी हूँ!
कहाँ सर रख दूँ?

तीनो जहाँ ना चाहूँ..
रहूँ, तो रहूँ,
बन भिकारन रहूँ...
तेरीही गोद चाहूँ...

ना छुडाना हाथ यूँ,
तुझबिन क्या करुँ?
अभी एक क़दम भी
चल ना पायी हूँ !

दर बदर भटकी है तू,
मै खूब जानती हूँ,
तेरी भी खोयी राहेँ,
पर मेरी तो रहनुमा तू!

"अम्मा ! आपके इतिहास की पुनुराव्रुत्ती मेरे साथ हुई...हम दोनों ने जब कभी, किसी औरको सहारा देके उठाना चाहा, उसने हम ही को गिराया...वो उठा या नही, ये नही पता...लेकिन हम ज़रूर आहत हुए....बार, बार जीवन ने हमारे संग ये खेल खेला...आज तक नही समझ सकी, कि, दो समांतर रेषायों की भाँती हमारी ज़िंदगी कैसे चली??

"कैसे, कैसे दर्द समेटे हम दोनों चलते रहे...रहगुज़र करते रहे...?सिलसिला है,कि, थमता नही....दोनों के जीवन में बेशुमार ग़लत फेहमियाँ शामिल रहीं...एक से निपट लेते तो दूसरी हाज़िर...! ये कैसे इत्तेफ़ाक़ रहे?

"बोहोत कुछ लिखना चाह रही हूँ..लेकिन, सारी उम्र कम पड़ सकती है...और किस उम्र की बात करूँ?? आपकी अनगिनत यादें लिख चुकी हूँ...फिरभी लगता है, अभी तो कुछ नही कहा...! कुछ भी नही! ये समापन किश्त है, या और सफ़र बाक़ी है, मेरे लेखन का...आपके लिए...??गर होगा तो, उसे कुछ अन्य नाम दे दूँगी...शुक्र गुजार हूँ, अम्मा आपकी, के, मुझे ऐसे अनुभव आपके रहते मिले.....के ऐसी माँ मिली...आपसे होके जो राह गुज़री, उसमे शामिल हर ममता को नमन....हर ममता को सलाम !"

समाप्त ।

5 comments:

vinay July 11, 2009 at 12:42 AM  

ma asi hoti hi hai,jiski god main sir rakh kar jeevan ke dukh sukh baten ja saktey hain.

वन्दना अवस्थी दुबे July 17, 2009 at 4:11 AM  

बहुत ही मार्मिक और यथार्थ आलेख..बधाई. आपके जिन ब्लौगों पर एम्बेडेड कमेंट बौक्स है, उन पर मेरी टिप्पणी पोस्ट नहीं हो पा रही.

'अदा' July 21, 2009 at 9:35 PM  

bahut hi sarthak lekh likha hai aapne...
maa ki god se bada sukh is dunia mein doosra hai kahan...

ज्योति सिंह December 17, 2009 at 4:08 AM  

दर बदर भटकी है तू,
मै खूब जानती हूँ,
तेरी भी खोयी राहेँ,
पर मेरी तो रहनुमा तू!
maa mujhe aanchal me chhupa .....
ise padh yahi geet yaad aa gaya ,marmik rachna

ज्योति सिंह December 17, 2009 at 4:15 AM  

ek gana aur yaad aa gaya
maa sunao mujhe wo kahani
jisme raja na ho ,na ho rani ,
wo kahani jo hansana sikha de ....
jisme such ki bhari chaandni ho
jisme umeed ki raushni ho
jisme gandh ho bhari dhara ki .....

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