Wednesday, April 22, 2009

गज़ब कानून..१...आतंकके ख़िलाफ़ जंग..

एक संस्मरण !

( अपनी श्रीन्ख्लासे एक ब्रेक लेके इस ज़रूरी संस्मरण को लिखना चाहती हूँ...वजह है अपने१५० साल पुराने, इंडियन एविडेंस एक्ट,(IEA) कलम २५ और २७ के तहेत बने कानून जिन्हें बदल ने की निहायत आवश्यकता है....इन कानूनों के रहते हमआतंकवाद या अन्य तस्करीसे निजाद पाही नही सकते...
इन कानूनों मेसे एक कानून के परिणामों का , किसीने आँखों देखा सत्य प्रस्तुत कर रही हूँ.....जिसपे आधारित एक सत्य घटनाका कहानीके रूपमे परिवर्तन करुँगी। डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल के अनुरोधपे " शोध दिशा" इस मासिक के लिए...)
CHRT( कॉमनवेल्थ ह्युमन राइट्स इनिशियेटिव .....Commonwealth Human Rights Initiative), ये संघटना 3rd वर्ल्ड के तहेत आनेवाले देशों मे कार्यरत है।
इसके अनेक उद्दिष्ट हैं । इनमेसे,निम्लिखित अत्यन्त महत्त्व पूर्ण है :
अपने कार्यक्षेत्र मे रिफोर्म्स को लेके पर्याप्त जनजागृती की मुहीम, ताकि ऐसे देशोंमे Human Rights की रक्षा की जा सके।
ये संघटना इस उद्दिष्ट प्राप्ती के लिए अनेक चर्चा सत्र ( सेमिनार) तथा debates आयोजित करती रहती है।
ऐसेही एक चर्चा सत्र का आयोजन, २००२ की अगस्त्मे, नयी देहली मे किया गया था। इस सत्र के अध्यक्षीय स्थानपे उच्चतम न्यायालयके तत्कालीन न्यायाधीश थे। तत्कालीन उप राष्ट्रपती, माननीय श्री भैरव सिंह शेखावत ( जो एक पुलिस constable की हैसियतसे ,राजस्थान मे कार्यरत रह चुके हैं), मुख्य वक्ता की तौरपे मौजूद थे।
उक्त चर्चासत्र मे देशके हर भागसे अत्यन्त उच्च पदों पे कार्यरत या अत्यन्त संवेदनशील क्षेत्रों से ताल्लुक रखनेवाली हस्तियाँ मोजूद थीं : आला अखबारों के नुमाइंदे, न्यायाधीश ( अवकाश प्राप्त या कार्यरत) , आला अधिकारी,( पुलिस, आईएस के अफसर, अदि), वकील और अन्य कईं। अपने अपने क्षेत्रों के रथी महारथी। हर सरकारी मेहेकमेकों के अधिकारियों के अलावा अनेक गैर सरकारी संस्थायों के प्रतिनिधी भी वहाँ हाज़िर थे। (ngos)

जनाब शेखावत ने विषयके मर्मको जिस तरहसे बयान किया, वो दिलो दिमाग़ को झक झोर देने की क़ाबिलियत रखता है।
उन्होंने, उच्चतम न्यायलय के न्यायमूर्ती( जो ज़ाहिर है व्यास्पीठ्पे स्थानापन्न थे), की ओर मुखातिब हो, किंचित विनोदी भावसे क्षमा माँगी और कहा,"मेरे बयान को न्यायालय की तौहीन मानके ,उसके तहेत समन्स ना भेज दिए जाएँ!"
बेशक, सपूर्ण खचाखच भरे सभागृह मे एक हास्य की लहर फ़ैल गयी !
श्री शेखावत ने , कानूनी व्यवस्थाकी असमंजसता और दुविधाका वर्णन करते हुए कहा," राजस्थान मे जहाँ, मै ख़ुद कार्यरत था , पुलिस स्टेशन्स की बेहद लम्बी सीमायें होती हैं। कई बार १०० मीलसे अधिक लम्बी। इन सीमायों की गश्त के लिए पुलिस का एक अकेला कर्मचारी सुबह ऊँट पे सवार हो निकलता है। उसके साथ थोडा पानी, कुछ खाद्य सामग्री , कुछ लेखनका साहित्य( जैसे कागज़ पेन्सिल ) तथा लाठी आदि होता है।
"मै जिन दिनों की बात कर रहा हूँ ( और आजभी), भारत पाक सीमापे हर तरह की तस्करी, अफीम गांजा,( या बारूद तथा हथियार भी हुआ करते थे ये भी सत्य है.....जिसका उनके रहते घटी घटनामे उल्लेख नही था) ये सब शामिल था, और है।
एक बात ध्यान मे रखी जाय कि नशीले पदार्थों की कारवाई करनेके लिए ,मौजूदा कानून के तहेत कुछ ख़ास नियम/बंधन होते हैं। पुलिस कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल, या सब -इंस्पेक्टर, इनकी तहकीकात नही कर सकता। इन पदार्थों की तस्करी करनेवाले पे, पंचनामा करनेकी विधी भी अन्य गुनाहों से अलग तथा काफी जटिल होती है।"
उन्होंने आगे कहा," जब एक अकेला पुलिस कर्मी , ऊँट पे सवार, मीलों फैले रेगिस्तानमे गश्त करता है, तो उसके हाथ कभी कभार तस्कर लगही जाता है।
"कानूनन, जब कोई मुद्देमाल पकडा जाता है, तब मौक़ाये वारदात पेही( और ये बात ह्त्या के केस के लिएभी लागू है ), एक पंचनामा बनाना अनिवार्य होता है। ऐसे पंचनामे के लिए, उस गाँव के या मुहल्ले के , कमसे कम दो 'इज्ज़तदार' व्यक्तियों का उपस्थित रहना ज़रूरी है।"

श्री शेखावत ने प्रश्न उठाया ," कोईभी मुझे बताये , जहाँ मीलों किसी इंसान या पानीका नामो निशाँ तक न हो , वहाँ, पञ्च कहाँ से उपलब्ध कराये जाएँ ? ? तो लाज़िम है कि , पुलिसवाला तस्करको पकड़ अपनेही ही ऊँट पे बिठा ले। अन्य कोई चारा तो होता ही नही।
"उस तस्करको पकड़ रख, वो पुलिसकर्मी सबसे निकटतम बस्ती, जो २०/ २५ किलोमीटर भी हो सकती है, ले जाता है। वहाँ लोगोंसे गिडगिडा के दो " इज्ज़तदार व्यक्तियों" से इल्तिजा करता है। उन्हें पञ्च बनाता है।
" अब कानूनन, पंचों को आँखों देखी हकीकत बयान करनी होती है। लेकिन इसमे, जैसाभी वो पुलिसकर्मी अपनी समझके अनुसार बताता है, वही हकीकत दर्ज होती है। "पञ्च" एक ऐसी दास्तान पे हस्ताक्षर करते हैं, जिसके वो चश्मदीद गवाह नही। लेकिन कानून तो कानून है ! बिना पंचानेमेके केस न्यायालय के आधीन होही नही सकता !!
" खैर! पंचनामा बन जाता है। और तस्कर या जोभी आरोपी हो, वो पुलिस हिरासतसे जल्द छूट भी जता है। वजह ? उसके बेहद जानकार वकील महोदय उस पुलिस केस को कानून के तहेत गैरक़ानूनी साबित करते हैं!!!तांत्रिक दोष...A technical flaw !
" तत्पश्च्यात, वो तस्कर या आरोपी, फिर से अपना धंदा शुरू कर देता है। पुलिस पे ये बंधन होता है की ३ माह के भीतर वो अपनी सारी तहकीकात पूरी कर, न्यायालयको सुपुर्द कर दे!! अधिकतर ऐसाही होता है, येभी सच है ! फिर चाहे वो केस, न्यायलय की सुविधानुसार १० साल बाद सुनवाईके लिए पेश हो या निपटाया जाय....!

"अब सरकारी वकील और आरोपी का वकील, इनमे एक लम्बी, अंतहीन कानूनी जिरह शुरू हो जाती है...."
फिर एकबार व्यंग कसते हुए श्री शेखावत जी ने कहा," आदरणीय जज साहब ! एक साधारण व्यक्तीकी कितनी लम्बी याददाश्त हो सकती है ? २ दिन २ माह या २ सालकी ??कितने अरसे पूर्व की बात याद रखना मुमकिन है ??
ये बेहद मुश्किल है कि कोईभी व्यक्ती, चश्मदीद गवाह होनेके बावजूद, किसीभी घटनाको तंतोतंत याद रखे !जब दो माह याद रखना मुश्किल है तब,१० सालकी क्या बात करें ??" (और कई बार तो गवाह मरभी जाते हैं!)
" वैसेभी इन २ पंचों ने (!!) असलमे कुछ देखाही नही था! किसीके " कथित" पे अपने हस्ताक्षर किए थे ! उस " कथन" का झूठ साबित करना, किसीभी वकील के बाएँ हाथका खेल है ! और वैसेभी, कानून ने तहेत किसीभी पुलिस कर्मी के( चाहे वो कित्नाही नेक और आला अफसर क्यों न हो ,) मौजूदगी मे दिया गया बयान ,न्यायलय मे सुबूतके तौरपे ग्राह्य नही होता ! वो इक़्बालिये जुर्म कहलाही नही सकता।( चाहे वो ह्त्या का केस हो या अन्य कुछ) ।(IEA ) कलम २५ तथा २७ , के तहेत ये व्यवस्था अंग्रेजों ने १५० साल पूर्व कर रखी थी, अपने खुदके बचाव के लिए,जो आजतक कायम है ! कोई बदलाव नही ! ज़ाहिरन, किसीभी पुलिस करमी पे, या उसकी बातपे विश्वास किया ही नही जा सकता ऐसा कानून कहता है!! फिर ऐसे केसका अंजाम क्या होगा ये तो ज़ाहिर है !"


10 comments:

AAKASH RAJ said...

आपका हिंदी ब्लॉग जगत में स्वागत है .....

रचना गौड़ ’भारती’ said...

ब्लोगिंग जगत में स्वागत है
लगातार लिखते रहने के लि‌ए शुभकामना‌एं
कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
http://www.rachanabharti.blogspot.com
कहानी,लघुकथा एंव लेखों के लि‌ए मेरे दूसरे ब्लोग् पर स्वागत है
http://www.swapnil98.blogspot.com
रेखा चित्र एंव आर्ट के लि‌ए देखें
http://chitrasansar.blogspot.com

वन्दना अवस्थी दुबे said...

ब्लौग जगत में आपका स्वागत है...

Abhishek Mishra said...

अच्छा संस्मरण प्रस्तुत किया आपने. स्वागत

VisH said...

waah achha jabab.....

VisH said...

waah post ka jabab nahi....

नारदमुनि said...

wah aap ne to aag laga di, narayan narayan

Deepak Sharma said...

मेरी सांसों में यही दहशत समाई रहती है
मज़हब से कौमें बँटी तो वतन का क्या होगा।
यूँ ही खिंचती रही दीवार ग़र दरम्यान दिल के
तो सोचो हश्र क्या कल घर के आँगन का होगा।
जिस जगह की बुनियाद बशर की लाश पर ठहरे
वो कुछ भी हो लेकिन ख़ुदा का घर नहीं होगा।
मज़हब के नाम पर कौ़में बनाने वालों सुन लो तुम
काम कोई दूसरा इससे ज़हाँ में बदतर नहीं होगा।
मज़हब के नाम पर दंगे, सियासत के हुक्म पे फितन
यूँ ही चलते रहे तो सोचो, ज़रा अमन का क्या होगा।
अहले-वतन शोलों के हाथों दामन न अपना दो
दामन रेशमी है "दीपक" फिर दामन का क्या होगा।
@कवि दीपक शर्मा
http://www.kavideepaksharma.co.in
इस सन्देश को भारत के जन मानस तक पहुँचाने मे सहयोग दे.ताकि इस स्वस्थ समाज की नींव रखी जा सके और आवाम चुनाव मे सोच कर मतदान करे.
काव्यधारा टीम

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

हिमांशु पाण्डेय said...

हमारे अतीत वर्तमान ऒर भविष्य के साथ जुडी बहुत ही गम्भीर समस्या उजागर करने के लिए साधुवाद। अनेकानेक कानून एसे है जॊ आये दिन एसी समस्याएं उत्पन्न करते हैं अभी हाल ही में एक मुस्लिम पति ने अपनी पत्नी कॊ तलाक दे दिया(तीन बार बॊल के) कानूनी व्यवस्था यह है कि अब यदि वह दुबारा अपने पति के साथ रहना चाहे तॊ उसे किसी गैर मर्द के साथ विवाह करना पडेगा उसे बाद ही वह अपने पति के साथ कानूनी रूप से रह सकती है ४० वर्ष की आयु ऒर ३ बच्चॊ के साथ यह उस महिला के लिए कितनी विषम परिस्थिति उत्पन्न करता है। कानून मे समय एवं आवश्यकता के साथ परिवर्तन बेहद जरूरी है। आपके लेख के लिए एक बार फिर धन्यवाद

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गज़ब कानून...! २

जारी है, श्री शेखावत, भारत के माजी उपराष्ट्रपती के द्वारा दिए गए भाषण का उर्वरित अंश:
श्री शेखावतजी ने सभागृह मे प्रश्न उपस्थित किया," ऐसे हालातों मे पुलिसवालों ने क्या करना चाहिए ? कानून तो बदलेगा नही...कमसे कम आजतक तो बदला नही ! ना आशा नज़र आ रही है ! क़ानूनी ज़िम्मेदारियों के तहत, पुलिस, वकील, न्यायव्यवस्था, तथा कारागृह, इनके पृथक, पृथक उत्तरदायित्व हैं।

"अपनी तफ़तीश पूरी करनेके लिए, पुलिस को अधिकसे अधिक छ: महीनोका कालावधी दिया जाता है। उस कालावाधीमे अपनी सारी कारवाई पूरी करके, उन्हें न्यायालय मे अपनी रिपोर्ट पेश करनेकी ताक़ीद दी जाती है। किंतु, न्यायलय पे केस शुरू या ख़त्म करनेकी कोई समय मर्यादा नही, कोई पाबंदी नही ! "

शेखावतजीने ऐलानिया कहा," पुलिस तक़रीबन सभी केस इस समय मर्यादा के पूर्व पेश करती है!"( याद रहे, कि ये भारत के उपराष्ट्रपती के उदगार हैं, जो ज़ाहिरन उस वक्त पुलिस मेहेकमेमे नही थे....तो उनका कुछ भी निजी उद्दिष्ट नही था...नाही ऐसा कुछ उनपे आरोप लग सकता है!)
"अन्यथा, उनपे विभागीय कारवाई ही नही, खुलेआम न्यायलय तथा अखबारों मे फटकार दी जाती है, बेईज्ज़ती की जाती है!! और जनता फिर एकबार पुलिस की नाकामीको लेके चर्चे करती है, पुलिसकोही आरोपी के छूट जानेके लिए ज़िम्मेदार ठहराती है। लेकिन न्यायलय के ऊपर कुछभी छींटा कशी करनेकी, किसीकी हिम्मत नही होती। जनताको न्यायलय के अवमान के तहत कारवाई होनेका ज़बरदस्त डर लगता है ! खौफ रहता है ! "
तत्कालीन उप राष्ट्रपती महोदयने उम्मीद दर्शायी," शायद आजके चर्चा सत्र के बाद कोई राह मिल जाए !"
लेकिन उस चर्चा सत्रको तबसे आजतक ७ साल हो गए, कुछभी कानूनी बदलाव नही हुए।

उस चर्चा सत्र के समापन के समय श्री लालकृष्ण अडवानी जी मौजूद थे। ( केन्द्रीय गृहमंत्री के हैसियतसे पुलिस महेकमा ,गृहमंत्रालय के तहेत आता है , इस बातको सभी जानतें हैं)।
समारोप के समय, श्री अडवाणीजी से, (जो लोह्पुरुष कहलाते हैं ), भरी सभामे इस मुतल्लक सवाल भी पूछा गया। ना उन्ह्नों ने कोई जवाब दिया ना उनके पास कोई जवाब था।
बता दूँ, के ये चर्चा सत्र, नेशनल पुलिस commission के तहेत ( 1981 ) , जिसमे डॉ. धरमवीर ,ICS , ने , पुलिस reforms के लिए , अत्यन्त उपयुक्त सुझाव दिए थे, जिन्हें तुंरत लागू करनेका भारत के अत्युच्च न्यायलय का आदेश था, उनपे बेहेस करनेके लिए...उसपे चर्चा करनेके लिए आयोजित किया गया था। आजभी वही घिसेपिटे क़ानून लागू हैं।
उन सुझावों के बाद और पहलेसे ना जाने कितने अफीम गांजा के तस्कर, ऐसे कानूनों का फायदा उठाते हुए छूट गए...ना जाने कितने आतंकवादी बारूद और हथियार लाते रहे, कानून के हथ्थेसे छूटते गए, कितने बेगुनाह मारे गए, कितनेही पुलिसवाले मारे गए.....और कितने मारे जायेंगे, येभी नही पता।
ये तो तकरीबन १५० साल पुराने कानूनों मेसे एक उदाहरण हुआ। ऐसे कई कानून हैं, जिनके बारेमे भारत की जनता जानती ही नही।
मुम्बई मे हुए ,सन २००८, नवम्बर के बम धमाकों के बाद, २/३ पहले एक ख़बर पढी कि अब e-कोर्ट की स्थापना की जा रही है। वरना, हिन्दुस्तान तक चाँद पे पोहोंच गया, लेकिन किसी आतंक वादीके मौजूदगी की ख़बर लखनऊ पुलिस गर पुणे पुलिस को फैक्स द्वारा भेजती, तो न्यायलय उसे ग्राह्य नही मानता ...ISIका एजंट पुणे पुलिसको छोड़ देनेकी ताकीद न्यायलय ने की ! वो तो लखनऊसे हस्त लिखित मेसेज आनेतक, पुणे पुलिस ने उसपे सख्त नज़र रखी और फिर उस एजंट को धर दबोचा।
सम्पूर्ण

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रोई आँखें मगर....१

रोई आँखें मगर.......

मई महीनेकी गरमी भरी दोपहर थी.... घर से कही बाहर निकलने का तो सवालही नही उठता था।....सोचा कुछ दराजें साफ कर लू। कुछ कागजात ठीकसे फाइलोमे रखे जाएँ तो मिलनेमे सुविधा होगी....

मैं फर्शपे बैठ गई और अपने टेबल की सबसे निचली दराज़ खोली। एक फाइलपे लेबल था,"ख़त"। उसे खोलके देखने लग गई और बस यादोंकी नदीमे हिचकोले खाने लगी......वो दिन १५ मई का था .......दादाजीका जन्म दिन....!!!

पहलाही ख़त था मेरे दादाजीका...... बरसों पहले लिखा हुआ!!!पीलासा....लगा,छूनेसे टूट ना जाय!! बिना तारीख देखे,पहलीही पंक्तीसे समझ आया कि , ये मेरी शादीके तुरंत बाद उन्होंने अपनी लाडली पोतिको लिखा था!! कितने प्यारसे कई हिदायतें दी थी!!
"खाना बनते समय हमेशा सूती साड़ी पहना करो...."!"बेटी, कुछ ना कुछ व्यायाम ज़रूर नियमसे करना....सेहेतके लिए बेहद ज़रूरी है....."!
मैंने इन हिदायतोको बरसों टाल दिया था........ पढ़ते,पढ़ते मेरी आँखें नम होती जा रही थी.....औरभी उनके तथा दादीके लिखे ख़त हाथ लगे...बुढापे के कारन काँपते हाथोँ से लिखे हुए..... जिनमे प्यार छल-छला रहा था!!
ये कैसी धरोहर अचानक मेरे हाथ लग गई,जिसे मैं ना जाने कब भुला बैठी थी!!ज़हन मे सिर्फ़ दो शब्द समा गए ..."मेरा बाबुल"..."मेरा बचपन"!!

बाबुल.....इस एक लफ़्ज़्मे क्या कुछ नही छुपा? विश्वास,अपनत्व,बचपना,और बचपन,किशोरावस्था और यौवन के सपने,अम्मा-बाबाका प्यार, दादा-दादीका दुलार,भाई-बेहेनके खट्टे मीठे झगडे,सहेलियों के साथ बिताये निश्चिंत दिन..... खेले हुए खेल, सावनके झूले, रची हुई मेहँदी, खट्टी इमली और आम....... सायकल सीखते समय गिरना, रोना, और सँभालना,......बीमारीमे अम्मा या दादीको अपने पास से हिलने ना देना...... उनसे कई बार सुनी कहानियाँ बार-बार सुनना, लकडी के चूल्हेपे बना खाना और सिकी रोटियाँ....... लालटेन के उजालेमे की गई पढाई..... क्योंकि मेरा नैहर तो गाँव मे था...बल्कि गाँवके बाहर बने एक कवेलू वाले घरमे .....जहाँ मेरे कॉलेज जानेके बाद किसी समय बिजली की सुविधा आई थी...
सुबह रेहेट्की आवाज़से आँखें खुलती थी। रातमे पेडोंपे जुगनू चमकते थे और कमरोंमेभी घुस आते थे जिसकी वजहसे एक मद्धिम-सी रौशनी छाई रहती।
अपूर्ण

3 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari said...

कई बार पुरानी यादों में खो जाना अच्छा लगता है.

शायदा said...

आप खु़शकि़स्‍मत हैं कि आपके पास एक ऐसा ख़त है जिसमें प्‍यार और वात्‍सल्‍य छलक रहा है, संभालकर रखिए इसे क्‍योंकि आने वाली जैनरेशन्‍स के पास ऐसे ख़त कहां होंगे....।

उन्मुक्त said...

यह कहानी है कि सत्य कथा?

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रोई आँखें मगर....! २

रोई आँखे मगर....2

दादा मेरे साथ खूब खेला करते थे। वो मेरे पीछे दौड़ते और हम दोनों आँखमिचौली खेलते। मैं पेडोंपे चढ़ जाया करती और वो हार मान लेते। सायकल चलाना उन्ह्नोनेही मुझे सिखाया और बादमे कारभी.....और सिखाई वक्त की पाबंदी, बडोंकी इज्ज़त करना और हमेशा सच बोलना, निडरता से सच बोलना। बाकी घरवालोनेभी यही सीख दी। हम गलतीभी कर बैठते, लेकिन उसे स्वीकार लेते तो डांट नही बल्कि पीठ्पे थप-थपाहट मिलती। निडरता से सच बोलनेकी सीखपे चलना मुश्किल था। कई बार क़दम डगमगा जाते, झूठ बोलके जान बचा लेनेका मोह होता, लेकिन हमेशा दादा याद आते,उनके बोल याद आते की जब कोई इंसान मृत्युशय्या पे हो तो उसके दिलमे कोई पश्चाताप नही होना चाहिए।
इसी बातपे मुझे बचपन की एक घटना याद आयी। हम तीनो भाई-बेहेन स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस से स्कूल आया जाया करते थे। एक दिन माँ ने हिदायत देके स्कूल भेजा मुझे की शामको शायद हमारी कार शेहेर आयेगी। अगर एक विशिष्ट जगह्पे कार दिखे तो छोटे भाईको बस स्टेशन पे ठीक से देख लेना तथा उसे साथ लेके आना। ना जाने क्यों, उस भीड़ भरी जगह्पे मैंने बोहोतही सरसरी तौरसे नज़र दौडाई और कारमे बैठ के घर आ गयी। माँ के पूछ्नेपे कहा की, मैंने तो ठीकसे देखा, राजू वहाँ नही था। माँ को शंका हुई की कही बेटा किसी बुरी संगतमे तो नही पड़ गया??जब देर शाम भाई बस से घर लौटा तो माँ ने उससे सवाल किया की वो शाम को बस स्टेशन पे नही था ...कहाँ गया था??उसने बताया की, वो तो बस स्टेशन पे ही था। माने उसे चांटा लगाया। उसने मासे कहा,"माँ तुम चाहो तो मुझे मारो,लेकिन मैं वहीं पे था...बल्कि मैंने दीदी को देखाभी....इससे पहले की मैं उनतक जाता,वो चली गयी...."। माने मेरी तरफ़ मुखातिब होके कहा,"तुमने राजूको ठीकसे देखा था?"
मेरी निगाहें झुक गयी। मुझे अपने आपपे बेहद शर्मिन्दगी महसूस हुई। आजभी जब वो घटना याद आती है तो मेरी आँखें भर आती हैं।
एकबार दादा से रूठ्के मैं पैदलही स्कूल निकल पडी। तब मेरी उम्र होगी कुछ दस- ग्यारह सालकी। स्कूल तकरीबन आठ किलोमीटर दूर था। दादाजीने अपनी सायकल उठायी और मेरे साथ-साथ चलने लगे। क़रीब दो-तीन किलोमीटर चल चुके तो एक बस आयी। बसका चालक दादाजीको जानता था। उसने मुझसे बसमे बैठने के लिए खूब मनुहार की ,लेकिन मैं थी की रोती जा रही थी,और अपनी ज़िद्पे अडी हुई थी। अन्तमे दादाजीने उसे जानेके लिए कह दिया। मैं पैदल चलकेही स्कूल पोहोंची।जब शाम मे स्कूल छूटी तो मैं बस स्टेशन के लिए निकल पडी। थोडीही दूरपे एक छोटी-सी पुलियापर दादाजी मेरा इंतज़ार कर रहे थे!!दिनभर के भूके-प्यासे!!बोले,"अब तुझे बसमे बिठाके मैं सायकल से घर आऊँगा।" मुझे आजतक इस बातपे ग्लानी होती है....काश.....काश,मैं इतनी जिद्दी ना बनी होती....!
अपूर्ण

2 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari said...

अच्छा लग रहा है आपके संस्मरण सुनना/ जारी रहें.

mamta said...

कभी-कभी जिंदगी मे ऐसा होता है।

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रोई आँखें मगर....! ३

रोई आँखे मगर....3

मुझे गर्मियोंकी छुट्टी की वो लम्बी-लम्बी दोपहारियाँ याद है, जब हम बच्चे ठंडक ढूँढ नेके लिए पलंगके नीचे गीला कपड़ा फेरकर लेटते थे। कभी कोई कहानीकी किताब लेकर तो कभी ऐसेही शून्यमे तकते हुए। चार साढे चार बजनेका इंतज़ार करते हुए जब हमे बाहर निकलनेकी इजाज़त मिलती। मेरी दादीको उनके भाईने एक केरोसीनपे चलनेवाला फ्रिज दिया था। वे हमारे लिए कुछ ठंडे व्यंजन बनाती, उनमेसे एकको "दूधके फूल" कहती। फ्रिजमे दूध-चीनी मिलके जमती और फिर उसे खूब फेंटती जाती, उसका झाग हमारे गिलासोंमे डालती और खालिहानसे लाई गेहुँकी "स्ट्रा" से हम उसे पीते। खेतमे बहती नेहरमे डुबकियाँ लगाते,आमका मौसम तो होताही। माँ हमे आम काटके देती और नेहरपे बनी छोटी-सी पुलियापे बिठा देती। हमलोग ना जाने कितने आम खा जाते!!तब मोटापा नाम की चीज़ पता जो ना थी!!
माँ और दादी हम दोनों बेहनोके लिए सुंदर-सुंदर कपड़े सिया करती। दादी द्वारा मेरे लिए कढाई करके सिला हुआ एक frock अब भी मैंने सँभाल के रखा है!!
छुट्टी के दिन,जैसे के हर रविवार को, माँ आवला, रीठा तथा सीकाकायी से हमारे बाल धोती।फिर लोबानदान मे जलते कोयलोंपे बुखुर और अगर डालके उसके धुएँसे हमारे बाल सुखाती। उसकी भीनी-भीनी खुशबू आजभी साँसोंमे रची-बसी है।

यादोंकी नदीमे जब घिरके हम हिचकोले खाते हैं, तो उसका कोई सिलसिला नही होता। जिस दिन जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु हुई थी, मुझे याद है,उनकी अन्तिम यात्राका आँखों देखा हाल आकाशवाणी पे सुनके मैं जारोज़ार रोई...कमेंटेटर के साथ-साथ...... उस दिन भयानक तूफान आया था। हमारे खेतके पुराने,पुराने पेड़ उखड के गिर पड़े थे, मोटी,मोटी डालें टूट गयी थी, मानो सम्पूर्ण निसर्ग मातम मना रहा हो। ये तूफान पूरे देशमे आया था उस दिन।
औरभी कैसी -कैसी यादें उमड़ रही हैं!!जब कॉलेज की पढाई के लिए मैं गाँव छोड़ शहर गयी तो दादीअम्मा के कंप कपाते होंठ और आँखों से बहता पानी याद आ रहा है।याद आ रही उनकी बताई एक बडीही र्हिदयस्पर्शी बात.....
जब मैं केवल तीन सालकी थी, तब मेरे पिता आन्ध्र मे फलोंका संशोधन करनेके लिए मेरे और माके साथ जाके रहे थे। हम तीनो चले तो गए,लेकिन किसी कारन कुछ ही महीनोमे लौटना पडा।
जब मैं थोडी बड़ी हुई तो दादीअम्मा ने बताया कि, हम लोगोंके जानेके बाद वे और दादाजी सूने-से बरामदेमे बैठ के एक दूसरेसे बतियाते थे और कहते थे अगर ये लोग लौट आए तो मैं मेरी पोती को गंदे पैर लेके पलंग पे चढ़ने के लिए कभी नही गुस्सा करूँगा , ....इन साफ सुथरी चद्दरों से तो वो छोटे-छोटे, मैले, पैरही भले!!घर के कोने-कोनेसे उसकी किलकारियाँ सुनायी पड़ती हैं.....!!!
अपूर्ण

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रोई आँखें मगर....!४

रोई आँखे मगर.....4

दादीअम्मा जब ब्याह करके अपनी ससुराल आई,तो ज्यादा अंग्रेज़ी पढी-लिखी नही थी, लेकिन दादाके साथ रहते,रहते बेहद अच्छे-से ये भाषा सीख गयीं। इतनाही नही, पूरे विश्वका इतिहास-भूगोलभी उन्होंने पढ़ डाला। हमे इतने अच्छे से इतिहास के किस्से सुनाती मानो सब कुछ उनकी आँखोंके सामने घटित हुआ हो!
उनके जैसी स्मरण शक्ती विरलाही होती है। उर्दू शेरो-शायरीभी वे मौका देख, खूब अच्छे से कर लेती। दादा-दादी मे आपसी सामंजस्य बोहोत था। वे एकदूसरे का पूरा सम्मान करते थे और एक दूसरेकी सलाह्के बिना कोई निर्णय नही लेते।
जब मैने आंतर जातीय ब्याह करनेका निर्णय लिया तो, एक दिन विनय के रहते उन्होंने मुझे अपने पास लेकर सरपे हाथ फेरा और सर थपथपाया........ मानो कहना चाह रहे हों, काँटा भी ना चुभने पाये कभी, मेरी लाडली तेरे पाओंमे, और तब मैने चुनी राह पर कितने फूल कितने काँटें होंगे,ये बात ना वो जानते थे ना मैं! फ़िर उन्होंने विनयजीका हाथ अपने हाथोंमे लिया और देर तक पकड़े रखा, मानो उनसे आश्वासन माँग रहे हों कि, तुम इसे हरपल नयी बहार देना........

मेरी दादी badminton और लॉन टेनिस दोनों खेलती थीं। एक उम्र के बाद उन्हें गठियाका दर्द रेहनेके कारण ये सब छोड़ना पडा। मेरे ब्याह्के दो दिन पहले मैने हमारे पूरे खेतका एक चक्कर लगाया था। वहाँ उगा हर तिनका, घांसका फूल, पेड़, खेतोंमे उग रही फसलें मैं अपने ज़हेन मे सदाके लिए अंकित कर लेना चाहती थी। लौटी तो कुछ उदास-उदास सी थी। दादीअम्माने मेरी स्थिती भांप ली। हमारे आँगन मे badminton कोर्ट बना हुआ था। मुझसे बोलीं,"चल हम दोनों एकबार badminton खेलेगे।"
उस समय उनकी उम्र कोई चुराहत्तर सालकी रही होगी। उन्होंने साडी खोंस ली, हम दोनोने racket लिए और खेलना शुरू किया। मुझे shuttlecock जैसे नज़रही नही आ रहा था। आँखोके आगे एक धुंद -सी छा गयी थी।हम दोनोने कितने गेम्स खेले मुझे याद नही, लेकिन सिर्फ़ एक बार मैं जीती थी।

उनमे दर्द सहकर खामोश रेहनेकी अथाह शक्ती थी। उनके ग्लौकोमा का ओपरेशन कराने हम पती-पत्नी उन्हें हमारी पोस्टिंग की जगाह्पे ले आए। वहाँ औषध -उपचार की बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध थी। दादी की उम्र तब नब्बे पार कर चुकी थी, इसलिए सर्जन्स उन्हें जनरल अनेस्थिशिया नही देना चाहते थे। केवल लोकल अनेस्थेशिया पे सर्जरी की गयी। मेरे पतीभी ऑपरेशन थिअटर मे मौजूद थे। दादीअम्माने एक दो बार डॉक्टर से पूछा ,"और कितनी देर लगेगी?"
डॉक्टर हर बार कहते,"बस, और दस मिनिट्स..."
अंत मे वो बोली,"आप तो घंटें भरसे सिर्फ़ दस मिनिट कह रहे हैं!!"

खैर, जब ऑपरेशन पूरा हुआ तो पता चला कि , लोकल अनेस्थिशिया का उनपे कतई असर नही हुआ था! सर्जन्स भी उनका लोहा मान गए। जब दूसरी आँख की सर्जरी थी तब भी वे मुझसे सिर्फ़ इतना बोली,"बेटा, इस बार जनरल अनेस्थिशिया देके सर्जरी हो सकती है क्या? पहली बार मुझे बोहोत दर्द हुआ था"!
बस, इसके अलावा उनको हुई किसी तकलीफ का उन्होंने कभी किसी से ज़िक्र नही किया।
क्रमशः

2 टिप्पणियाँ:

ajay kumar jha said...

shama jee,
sadar abhivaadan. aaj pehlee baar hee apko padhaa aur yakeen maaniye apne kafee prabhaavit kiya . likhtee rahein

Udan Tashtari said...

जारी रहिये, पढ़ रहे हैं.

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रोयीं आँखें मगर.....५

रोई आँखें मगर....5

मेरे ब्याह्के कई वर्षों बाद एक बार मैं अपने मायके आई थी कुछ दिनोके लिए। शयनकक्ष से बाहर निकली तो देखा बैठक मे दादाजी के साथ एक सज्जन बैठे हुए थे। दादा ने झट से कहा,"बेटा, इन्हे प्रणाम करो!'
मैंने किया और दादाजी से हँसके बोली,"दादा अब मेरी उम्र चालीस की हो गई है! आप ना भी कहते तो मैं करती!"
दादा कुछ उदास,गंभीर होके बोले,"बेटा, मेरे लिए तो तू अब भी वही चालीस दिनकी है, जैसा की मैंने तुझे पहली बार देखा था, जब तुझे लेके तेरी माँ अपने मायके से लौटी थी....!!"
मेरे दादा -दादी गांधीवादी थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम मे भाग लिया था तथा जब गांधीजी ने युवा वर्ग को ललकारा की वे ग्राम सुधार मे तथा ग्राम जागृती मे लग जाएं, तो दोनों मुम्बई का मेहेलनुमा,संगेमरमर का पुश्तैनी मकान छोड़ गाँव आ बसे और खेती तथा ग्राम सुधार मे लग गए। गाँव मे कोई किसी भी किस्म की सुविधा नही थी। दोनों को जेलभी आना जाना पड़ता था, इसलिए उन्होंने उस ज़मानेमे परिवार नियोजन अपनाकर सिर्फ़ एकही ऑलाद को जन्म दिया, और वो हैं मेरे पिता। मुझे मेरे दादा-दादी पे बेहद गर्व रहा है। उन्हें लड़कीका बड़ा शौक़ था। मेरे जन्म की ख़बर सुनके उन्हों ने टेलेग्राम वालेको उस ज़मानेमे, खुश होके १० रुपये दे दिए!!वो बोला ,आपको ज़रूर पोता हुआ होगा!!
उनके अन्तिम दिनोंके दौरान एकबार मैं अपने पीहर गयी हुई थी। अपनी खेती की जगह जो एकदम बंजर थी(उसके छायाचित्र मैंने देखे थे),उसको वाकई उन्होंने नंदनवन मे परिवर्तित कर दिया था। एक शाम उन्होंने अचानक मुझसे एक सवाल किया,"बेटा, तुझे ये जगह लेनेका मेरा निर्णय कैसा लगा?"
ना जाने मेरे दिलमे उस समय किस बातकी झुन्ज्लाहट थी,मैं एकदमसे बोल पडी,"निर्णय कतई अच्छा नही लगा, हमे स्कूल आने जाने के लिए कितने कष्ट उठाने पड़ते थे, और...."ना जाने मैंने क्या-क्या बक दिया। वे बिलकूल खामोश हो गए। मुझे तुरंत उनकी क्षमा मांगनी चाहिए थी, लेकिन मैंने ऐसा नही किया...

दूसरे दिन मैं वापस लौट गयी। उन दिनों हमलोग मुम्बई मे थे। बादमे मैंने सोचा, उन्ह्ने एक माफी का ख़त लिख दूँगी.... लिखा भी.... लेकिन पोस्ट किया उसी दिन उनके देहान्तकी ख़बर आयी..... जिस व्यक्ती ने मेरे लिए इतना कुछ किया था, उसी व्यक्ती को मैंने उनके अन्तिम समयमे ऐसे कटु शब्द सुना दिए! क्या हासिल हुआ मुझे!मैं अपनी ही निगाहोंमे ख़ुद गिर गयी.....

जबतक हमलोग मेरे पीहर पोहोंचे, उनकी अर्थी उठ चुकी थी। वे बेहद सादगी से अपना अन्तिम कार्य करना चाहते थे। अपने लिए खादी का कफ़न दोनोहीने पहलेसे लेके रखा हुआ था.....
पर जब शेहेर और गाँव वालों को उनके निधन की वार्ता मिली, तो सैकडों लोग इकट्ठा हो गए। हर जाती-पाती के लोगोंने कान्धा दिया। एक नज्म है,"मधु" के नामसे लिखनेवाले शायर की, जो दादी सुनाया करती थी,"मधु"की है चाह बोहोत, मेरी बाद वफात ये याद रहे,खादीका कफ़न हो मुझपे पडा, वंदेमातरम आवाज़ रहे,मेरी माता के सरपे ताज रहे"।
उनकी मृत्यु जिस दिन हुई, वो उनकी शादी की ७२वी वर्ष गाँठ थी। जिस दिन उन दोनों का सफर साथ शुरू हुआ उसी दिन ख़त्म भी हुआ.....
मेरी दादी के मुँह से मैंने, उनकी अपनी जिन्दगीके बारेमे कभी कोई शिकायत नही सुनी। मेहेलसे आ पोहोंची एक मिट्टी के घरमे, जहाँ पानी भी कुएसे भरके लाना होता था......ना वैद्यकीय सुविधाएँ,ना कोई स्कूल,ना बिजली....अपने इकलौते बेटेको सारी पढाई होने तक दूर रखना पड़ा। उन्हें राज्यसभाका मेंबर बननेका मौक़ा दिया गया,लेकिन उन्होंने अपने गाँव मेही रहना चाहा।
दादाजी के जानेके बाद दो सालके अन्दर-अन्दर दादी भी चल बसी। जब वे अस्पतालमे थी, तब एकदिन किसी कारण, ५/६ नर्सेस उनके कमरेमे आयी। उन्होंने दादी से पूछा," अम्मा आपको कुछ चाहिए?"
दादी बोली," मुझे तुम सब मिलके 'सारे जहाँसे अच्छा,हिन्दोस्ताँ हमारा',ये गीत सुनाओ!"

सबने वो गीत गाना शुरू किया। गीत ख़त्म हुआ और दादी कोमा मे चली गयी। उसके बाद उन्हें होश नही आया।

इन दोनोने एक पूरी सदी देखी थी। अब भी जब मैं पीहर जाती हूँ तो बरामदेमे बैठे वो दोनों याद आते हैं। एक-दूजे को कुछ पढ़ के सुनाते हुए, कभी कढाई करती हुई दादी, घर के पीतल को पोलिश करते दादा.....मेरी आँखें छलक उठती हैं....जीवन तो चलता रहता है....मुस्कुराके...या कभी दिलपे पत्थर रखके,जीनाही पड़ता है....
पर जब यादें उभरने लगती हैं,बचपनकी,गुज़रे ज़मानेकी तो एक बाढ़ की तरह आतीं हैं.....अब उन्हें रोक लगाती हूँ, एक बाँध बनाके।
समाप्त

4 टिप्पणियाँ:

PD said...

dil ko chhoo lene vali rachana..

अनिल रघुराज said...

लिखते रहिए। ऐसे अनुभवों को सामने लाना जरूरी है। बहुतों को अपना अतीत याद आएगा, किस्से याद आएंगे, हकीकत याद आएगी। अच्छा लिखा है।

DR.ANURAG said...

सच्चे दिल से लिखी हुई एक रचना ..जिसमे आपके अहसास बखूबी झलकते है...लिखती रहे.....

Udan Tashtari said...

पूरे बहाव के साथ बहे पूरी श्रृंख्ला में. जीवन तो चलता रहता है-बस यही मूल मंत्र है.

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